राजा दशरथ ने नहीं इन्होंने बसाई थी अयोध्या नगरी, जानिए क्या है पौराणिक इतिहास?

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New Delhi: पांच सौ साल बाद एकबार फिर से राम की नगरी अयोध्या में रौनक लौटने लगी है। यहां राम जन्म भूमि पर भगवान राम की भव्य मंदिर के निर्माण के लिए कल भूमि पूजन होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कल भूमि पूजन कर मंदिर निर्माण की आधारशिला रखेंगे। राम मंदिर के निर्माण के बाद यह देश का सबसे शानदार और खूबसूरत मंदिर होगा। राम मंदिर बन जाने के बाद यहां पर बड़ी संख्या में भक्त भगवान राम के दर्शन करने के लिए आएंगे। अयोध्या में राम मंदिर के अलावा भी कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं जिसका काफी महत्व है।

रिसर्च से पता चलता है कि भगवान राम का जन्म आज से 7128 वर्ष पूर्व अर्थात 5114 ईस्वी पूर्व को उत्तरप्रदेश के अयोध्या नगर में हुआ था।

हिंदू धर्म में अयोध्या का धार्मिक महत्व काफी है। भारत के प्राचीन नगरों में से अयोध्या एक है। हिंदू पौराणिक मान्याताओं के अनुसार सप्त पुरियों में अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, अंवतिका और द्वारका को शामिल किया गया है। ये सभी सातों मोक्षदायिनी और पवित्र नगरियां यानी पुरियां हैं। चार वेदों में पहले अथर्ववेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर माना है। अयोध्या में भगवान राम का जन्म हुआ था। अयोध्या नगरी सरयू नदी के किनारे पर बसा हुआ है। रामायण के अनुसार राजा मनु ने अयोध्या बसाई थी। अयोध्या का संबंध न सिर्फ भगवान राम से है बल्कि यहां बौद्ध, जैन और इस्लाम धर्म का भी है।

भगवान श्रीराम के बाद बाद लव ने श्रावस्ती बसाई और इसका स्वतंत्र उल्लेख अगले 800 वर्षों तक मिलता है। कहते हैं कि भगवान श्रीराम के पुत्र कुश ने एक बार पुन: राजधानी अयोध्या का पुनर्निर्माण कराया था। इसके बाद सूर्यवंश की अगली 44 पीढ़ियों तक इसका अस्तित्व बरकरार रहा। महाभारत के युद्ध के बाद अयोध्या उजड़-सी गई लेकिन उस दौर में भी श्रीराम जन्मभूमि का अस्तित्व सुरक्षित था और लगभग 14वीं सदी तक बरकरार रहा। तथ्यों के मुताबिक, बाबर के आदेश पर सन् 1527-28 में अयोध्या में राम जन्मभूमि पर बने भव्य राम मंदिर को तोड़कर एक मस्जिद का निर्माण किया गया। कालांतर में बाबरी के नाम पर ही इस मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद रखा।

मान्यता है कि धरती के प्रथम पुरुष मनु ने अयोध्या की स्थापना की थी। माना जाता है कि देवताओं के कहने पर मनु राजा बनने के लिए तैयार हुए और अयोध्या को राजधानी बनाया। सरयू नदी के तट पर बसे इस नगर को रामायण अनुसार प्रथम धरतीपुत्र ‘स्वायंभुव मनु’ ने बसाया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्मा से जब मनु ने अपने लिए एक नगर के निर्माण की बात कही तो वे उन्हें विष्णुजी के पास ले गए। विष्णुजी ने उन्हें अवधधाम में एक उपयुक्त स्थान बताया। विष्णुजी ने इस नगरी को बसाने के लिए ब्रह्मा तथा मनु के साथ देवशिल्‍पी विश्‍वकर्मा को भेज दिया। हालांकि इस नगर की रामायण अनुसार विवस्वान (सूर्य) के पुत्र वैवस्वत मनु महाराज द्वारा स्थापना की गई थी। माथुरों के इतिहास के अनुसार वैवस्वत मनु लगभग 6673 ईसा पूर्व हुए थे।

मान्यता है कि अयोध्या नगरी भगवान विष्णु के चक्र पर स्थित है। स्‍कंदपुराण के अनुसार अयोध्‍या भगवान विष्‍णु के चक्र पर विराजमान है। अयोध्या का सबसे पहला वर्णन अथर्ववेद में मिलता है। अथर्ववेद में अयोध्या को ‘देवताओं का नगर’ बताया गया है, ‘अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या’।

तकरीबन दो हजार साल पहले अयोध्या की राजकुमारी सुरीरत्ना नी हु ह्वांग ओक अयुता (अयोध्या) दक्षिण कोरिया के ग्योंगसांग प्रांत के किमहये शहर की महारानी बनी थी। चीनी भाषा में दर्ज दस्तावेज सामगुक युसा में कहा गया है कि ईश्वर ने अयोध्या की राजकुमारी के पिता को स्वप्न में आकर ये निर्देश दिया था कि वह अपनी बेटी को उनके भाई के साथ राजा सुरो से विवाह करने के लिए किमहये शहर भेजें। आज कोरिया में कारक गोत्र के तकरीबन साठ लाख लोग खुद को राजा सुरो और अयोध्या की राजकुमारी का वंशज मानेत हैं।

अयोध्या राम ही नहीं बल्कि उनके तीनों भाइयों और जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का भी जन्म हुआ था जो कि श्रीराम के कुल के ही थे। अयोध्या में ऋषभनाथ के अलावा अजितनाथ, अभिनंदननाथ, सुमतिनाथ और अनंतनाथ का भी जन्म हुआ था इसलिए यह जैन धर्म के लिए बहुत ही पवित्र भूमि है। ऋषभनाथ के पुत्र भरत ने कई काल तक यहां राज किया। श्रीमद्भागवत के पञ्चम स्कंध एवं जैन ग्रंथों में चक्रवर्ती सम्राट राजा भरत के जीवन एवं उनके अन्य जन्मों का वर्णन आता है। महाभारत के अनुसार भरत का साम्राज्य संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में व्याप्त था। अयोध्या इनकी राजधानी थी। इनके ही कुल में राजा हरिशचंद्र हुए और आगे चलकर उपर बताए गए महान राजा हुए।

वहीं गंगा को धरती पर लाने वाले भगीरथ और सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र जैसे यशस्वी शासकों से भी विभूषित रही। वैदिक ग्रंथों के अनुसार अयोध्या आदर्श राजा और राज्य की परिकल्पना की पहली साकार नगरी है, जिसने दुनिया भर में मानवता का सूत्रपात किया। जो सदियों तक रघुवंशियों की राजधानी रही और जिसे सप्तपुरियों में अग्रणी माना गया।

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